यीशु मसीह के 12 चेलों की मृत्यु कैसे हुई | How Did the 12 Apostles Die?

How Did the 12 Apostles Die in Hindi. 12 chelon ki mrutyu kaise hui
12 चेलों की मृत्यु कैसे हुई


Praise the Lord. How Did the 12 Apostles Die? 12 चेलों की मृत्यु कैसे हुई. यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के बाद उनके चेलों ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर प्रभु यीशु के कार्य को आगे बढ़ाया. और जगह जगह जाकर यीशु मसीह की गवाही दी. चेलों ने निडर होकर यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान का प्रचार किया. चेलों ने जीने के एक नए तरीके के आगमन की शुरुआत की, और आज्ञा के अनुसार, वे सुसमाचार को पृथ्वी की छोर तक ले गए.


पर क्या आप जानते हैं कि, येशु मसीह के स्वर्गारोहण के बाद उनके सुसमाचार को दुनिया के कोने कोने तक ले जाने वाले उनके शिष्यों के साथ दुनिया ने कैसा व्यवहार किया. उन्हें किस प्रकार मृत्यु का सामना करना पड़ा. आज के इस लेख में हम यीशु मसीह के 12 चेलों की मृत्यु कैसे हुई इस बात पर चर्चा करेंगे.


बाइबल में मत्ती 10:2-4, मरकुस 3:16-19 और लुका 6:13-16 में यीशु मसीह के 12 शिष्यों के नाम सूचीबद्ध किए गए है. नए नियम में यीशु के 12 चेलों में से केवल दो चेलों की मृत्यु के बारे में लिखा गया है. एक यहूदा इस्करियोती(मत्ती 27: 3-10), जिसने यीशु को धोका दिया और दूसरा, जब्दी के पुत्र याकूब(प्रेरित 12:2), हालाँकि अन्य शिष्यों का मृत्यु कैसे हुआ यह बाइबिल में दर्ज नहीं हैं. 


अन्य चेलों की मौतों के बारे में हम जो जानते हैं उनमें से अधिकांश पुराने मसीही लेखकों और कलिसियाँओं की प्रथाओं से ली गई है, जिसकी पुष्टि नहीं की जा सकती है. लेकिन एक बात सुनिश्चित है कि, सभी शिष्यों को उनकी गवाही के लिए बहुत कष्ट हुआ और ज्यादातर मामलों में क्रूर मौतें हुईं.


यीशु मसीह के 12 प्रेरितों  की मृत्यु कैसे हुई | How Did the 12 Apostles Die? 


1. शमौन 


शमौन जिसे पतरस भी कहा जाता है. यीशु मसीह के सबसे प्रमुख शिष्यों में से एक था, और प्रारंभिक ईसाई कलिसियाँ के अग्रणीय प्रेषितों में से एक था (कैथोलिक परंपरा का दावा है कि वह पहले पोप थे).

पतरस की मृत्यु 64 ईस्वी में नीरो सम्राट के शासनकाल में हुआ था. नीरो के राज के दौरान रोम में भयंकर आग लगी थी. और आग लगने का दोष नीरो ने मसीहीयो पे लगाया था. नीरो ने मसीह लोगों की उत्पीडन शुरू कर दिया था. उसी दौरान पतरस को  सूली पर उल्टा चढ़ा दिया गया था. इसका दावा पतरस के प्रेरितों के काम नामक एक दूसरी शताब्दी के एपोक्रिफ़ल पुस्तक में किया गया था. सम्राट नीरो द्वारा पतरस को क्रूस पर उसी के कहने पर सिर नीचे और पैर ऊपर करके लटकाया गया. क्योंकि पतरस ने कहा था, जिस तरह मेरा प्रभु क्रूस पर लटकाया गया मैं इस योग्य नहीं हूं इसलिए मुझे उल्टा लटकाया जाए.


2. अन्द्रियास


अन्द्रियास पतरस के भाई थे. जो सबसे पहले यीशु मसीह के चेले बने. प्रेरितों के काम की एपोक्रिफ़ल पुस्तक के अनुसार, अन्द्रियास को यूनानी शहर पैट्रस में लगभग 60 ईस्वी पूर्व में क्रूस पर बांधकर मारा गया. उस पर पथराव भी किया गया जहां 2 दिन बाद उसकी मृत्यु हुई. अपने भाई पतरस की तरह, अन्द्रियास भी खुद को यीशु की तरह मरने के योग्य नहीं मानते थे। और इसलिए वह एक क्रूस से बंधा हुआ था जिसे टी आकार के बजाय एक्स आकार में लटका दिया गया था। कहा जाता है कि, अन्द्रियास ने अपने मृत्यु तक क्रूस पर से प्रचार किया था.


3. यूहन्ना


जब्दी के पुत्र याकूब का भाई यहुन्ना यीशु मसीह का सबसे प्रिय शिष्य था. पेशे से मछुआरा रहे यहुन्ना यीशु मसीह के सभी चेलों में सबसे छोटा भी था. दूसरी और तीसरी शताब्दी में एक मसीही लेखक टर्टुलियन ने दावा किया कि, मसीह विरोधियों ने यहुन्ना को मारने के लिए उबलते हुए तेल की कढ़ाई में डाल दिया, लेकिन उसे कुछ नहीं हुआ और वह बच गया. यह आश्चर्यकर्म देखकर वहां के सभी लोग मसीह धर्म में परिवर्तित हो गए. इस स्थान पर आज चर्च बनाया गया है.

बाद में, 90 के दशक में डोमिशन की सताहट के दौरान, यहुन्ना को पत्तमुस टापू पर काले पानी की सजा दी गई. इसी पत्तमुस टापू पर यहुन्ना ने प्रकाशितवाक्य लिखा. पत्तमुस टापू से काले पानी की सजा के बाद उसे मुक्त कर दिया गया. सजा से मुक्ति मिलने के बाद यहुन्ना फिर सेवा में लौटे और प्रभु की सेवा को आगे बढ़ाया. यहुन्ना अपनी आयु के पुरे दिन जिए. और वह एक बूढ़े आदमी के रूप में एक प्राकृतिक मौत मर गया. यहुन्ना ही ऐसा एकमात्र प्रेरित है, जो शांति से मरा हो.


4. याकूब


जब्दी का पुत्र याकूब की मृत्यु के बारे में हम प्रेरितों के काम की पुस्तक में पढ़ते हैं, प्रेरितों के काम 12: 1-2 में लिखा हैं : “उसी समय राजा हेरोदेस ने कलीसिया के कुछ लोगों को सताने के उद्धेश्य से बन्दी बना लिया. और तलवार से योहन के भाई याक़ोब की हत्या करवा दी". राजा हेरोदेस उसे मारकर यहूदियों को खुश करना चाहता था (प्रेरितों के काम 12: 3)। विद्वानों का मानना ​​है कि वह यरूशलेम में 44 ईस्वी में मारा गया था.


5. फिलिप्पुस


येशु के स्वर्गारोहण के बाद, फिलिप्पुस रूस चला गया, जहाँ पर उसने 20 वर्ष तक प्रचार किया. बाद में वह फ्रिगिया गया, वहां सुसमाचार का विरोध करने वालों ने ईस्वी सन् 80 में फिलिप्पुस को क्रूस से बांध दिया और उस पर पथराव भी किया गया जिससे उसकी मृत्यु हो गई. आपको बता दे कि, अन्द्रियास प्रभु का पहला चेला था तो वहीं फिलिप्पुस को यीशु मसीह का दूसरा चेला बनने का सौभाग्य मिला था.

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6. बरतुलमै 


माना जाता है कि, बरतुलमै ने भारत में भी प्रचार किया. उन्होंने मत्ती रचित सुसमाचार का इब्रानी भाषा में भी अनुवाद किया जिसे वह भारत लाया था. एक मान्यता के अनुसार बारबुस राजा की आज्ञा से आर्मीनिया में ईस्वी सन् 71 में बरतुलमै को जीवित चमड़ी उतार कर क्रूस पर चढ़ाया गया और वहीं मृत्यु हो गई थी|


7. थोमा


यीशु मसीह के पुनरुत्थान के बाद  “जब तक मैं उसके हाथों में कीलों के निशान न देख लूँ और उनमें अपनी उँगली न डाल लूँ तथा उसके पंजर में अपना हाथ न डाल लूँ, तब तक मुझे विश्वास नहीं होगा.” कहने वाले थोमा भी यीशु के स्वर्गारोहण के बाद येशु के कार्य को आगे बढ़ाने में जुट गए.

कहा जाता है कि, थोमा ने मध्यपूर्व में सबसे पहले प्रचार किया, फिर वह भारत आया. यहां वह ईस्वी सन 50 में पंहुचा, और बहुत प्रचार करके 7 कलीसिया स्थापित किया. थोमा ने भारत में जमकर प्रचार किया. थोमा के प्रचार से तंग आकर कुछ लोगों ने उसे भाले से मारा. एपोक्रिफ़ल प्रेरितों के काम में और सीरियाई मसीही परंपरा भी यह बताती है कि, यह प्रेरित भारत के मायलापुर में शहीद हो गया, जहाँ उस पर भाले से वार किया गया था. थोमा के शव को जहा गाड़ा गया आज वहा पर एक बड़ा चर्च है.


8. महसूल लेनेवाला मत्ती



चुंगी लेने वाला मत्ती ने अनेक देशों में जाकर खूब प्रचार किया और येशु के बारे में और उसके पुनरुत्थान के बारे में गवाही दी. अलेक्ज़ेंड्रा के क्लेमेंट के अनुसार मत्ती ने 15 वर्ष तक प्रचार किया. माना जाता है कि, ईस्वी सन 60 में प्रचार के दौरान मत्ती को इथोपिया में तलवार से मार डाला गया.

9. याकूब


याकूब, हलफई का पुत्र और प्रेरित मत्ती का भाई था. बाइबिल में याकूब के बारे में बहुत कम वर्णन किया गया है. उसके बारे में यह कहा जाता है कि, याकूब से दुश्मनी रखने वाले अलिविनस ने इसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा. अलिविनस ने याकूब को यरूशलेम के कंगूरे पर प्रचार करने के लिए आमंत्रित किया, ताकि सब लोग सुन सके. जब याकूब प्रचार करने लगा तब लोगों ने उसे कंगूरे से नीचे फेंक दिया परंतु वह मरा नहीं, तब लोगों ने पथराव करके उसे मार डाला.

दूसरी और तीसरी शताब्दी में रहने वाले एक धर्मविज्ञानी हिप्पोलिटस ने याकूब की मृत्यु के बारे में दर्ज किया है कि, “हलफै का पुत्र याकूब, जब यरूशलेम में यहूदियों को उपदेश देते हुए मौत के घाट उतार दिया गया था, और मंदिर के बगल में वहीं दफनाया गया था”


10. तद्दै



तद्दै को यहूदा नाम से भी जाना जाता हैं. लुका ने तद्दै का नाम “याकूब के बेटा यहूदा” (लुका 6:16 और प्रेरितों के काम 1:13) और यूहन्ना ने तद्दै का उल्लेख, “यहूदा (इस्करियोती नहीं)” किया हैं. (यूहन्ना 14:22)


तद्दे का नाम सुसमाचार में शमौन के साथ आता है माना जाता है कि ये दोनों अच्छे मित्र थे. तद्दे, अर्मेनिआ के शहर में ईस्वी सन् 50 में प्रचार करते हुए शहीद हुए और अरारात शहर में इन्हे तीरो से मारा गया.


11. शमौन कनानी


शमौन कनानी ने जगह जगह जाकर यीशु मसीह की गवाही दी. वह ब्रिटेन भी गया सभी स्थानों पर आश्चर्यकर्म भी किए और अनेक कष्ट भी सहे यह मेसोपोटामिया भी गया. 

शमौन कनानी की मौत के अलग-अलग लेखे-जोखे हैं. द गोल्डन लीजेंड और मिस्र का कोपतीक चर्च यह मानता है कि फरसिया में प्रचार के दौरान शहीद हुए उन्हें क्रूस पर टांग कर मारा गया. पाँचवीं शताब्दी में, कोरेने के मूसा ने दर्ज किया कि, शमौन कनानी इबेरिया राज्य में शहीद हो गए. साथ ही, इथियोपियाई मसीही दावा करते हैं कि उन्हें सामरिया में सूली पर चढ़ाया गया था. और सोलहवीं शताब्दी में, जस्टस लिपसियस ने दर्ज किया कि उसे आधे हिस्से में काटा गया था.


12. मत्तिय्याह


यह वह शिष्य है जिसे यहूदा इस्करियोती (प्रेरितों 1: 12-26) की जगह दी गई थी. एक प्रथा के अनुसार, उसे एटिओपिया (जॉर्जिया) में नरभक्षी द्वारा पत्थरवाह से मार दिया गया था. वहीं एक और प्रथा कहती है, वह यरूशलेम में यहूदियों द्वारा पत्थरवाह किया गया था और फिर सिर कलम कर दिया गया।

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